Sunday, June 1, 2014

तुम्हारी याद जो है...

सुबहों में एठें हुए खाली हाथों मे 
ऐसा लगता है
खोखले कपों से रिसती है चाय 
इस सुबह में ऐसा लगता है
चांदी का वर्क लपेट के ठूस दी गई है खुशबू
अब भी बिस्तर से समेट के 
जाने कौन इस तन का बोझ
उठा के  चल देता है कई रोज
रूह रिसती तो थी बदन से
पर रास्ते में निशां नहीं पड़ते
खत्म हो चुकी होगी शायद ।


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तुम्हारी याद जो है...
आंखों में ड्राप डालनी है ना,
सो आ रही है !


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तुम्हें चुप कराने के कई तरीकें सोचे हैं
ये सोचकर की तुम फिर बोलोगे कभी ।


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