Monday, January 9, 2017

रेलगाड़ी

१)कमर में स्वेटर बांध, कुछ मील कड़ी धूप में
मट्टी के टीलों के इस ओर, पतझड़ के पेड़ों के नीचे
छितरी हुई छांव के बीच
पानी की आखिरी दो घूंट बोतल में बचाए हुए
एक पैदल सफ़र का बकाया याद है ।
मैने तो लगता था कि जिन्दगी ठहर सी गई है
पर उसे शायद, लगता है ठीक ठीक यहीं पहुंचना था.॥

२) पहला ही रोजगार और घाटा ही घाटा
सौदा तुम पे हो यारों तो ऐसा न हो ।

३)"कितनी ही चम्मचें खोई है ,खाई हैं मिर्चियां !
हर बार इक रोटी बचाई , किसके लिये ?
किसके लिये दाने रखे, जूठे चखे, किसके लिये ?
कभी चींटी से चीनी के भी सौदे किये , जिसके लिये !!"

४)ट्रेन जब कभी किसी मुड़े हुए ट्रैक पे खुद को पलट के देखती है, सीटी बजाती है !|
C1 की विंडो सीट पे कहीं तुम तो नहीं ?

५)यही हासिल-ए-मुलाकात रह गया
तुम सवा हो गई मैं पौना रह गया !!

Monday, February 8, 2016

अफवाह

1) मैं चल सकता था पर घर पे ही रहता था
कोर्ई नाम होता तुम्हारा, गर तुम होती |
जां से ज्यादा किस की कैफियत में उदास रहता,
इक यार है ये कमरा.
जिससे तुम्हारी शिकायत करता रहता हूँ।
हिज्र के स्टेटस बदलते रहते हैं
सीढ़ी पे जां मिलते ही
गिरा देती है कमर के बल
मैं घर पे ही रह सकता हूँ पर चलना चाहता हूँ ।



2)दीवार पे एक तितली बैठी है छोटी सी -खूबसूरत !
थोड़ी दूर 10 सेंटीमीटर पर एक मकड़ी
तितली की तरफ बड़ रही है - भयानक !
सोच रहा हूँ तितली को उड़ा दूं- दया !
पर उससे मकड़ी भूखी रह जाए , शायद भूख से मर जाए - असमंजस !!
मेरा कुछ भी करना या ना करना - दखल ।
तितली आप उड़ गयी - तितली के लिए खुश मकड़ी के लिए अफ़सोस।
मैं उड़ा, मैं बचा, मैं भूखा रहा, और मैं ही देख रहा हूँ-एकमात्र संभावना ।

3) गिरेबां से खींच के तोड़े हैं जो बटन तुमने 
काज में अब भी अटकते नहीं 
सुई ने सीना ही सिल दिया हो तो कोई क्या कीजे |

4) अफवाह उड़ा रहा हूँ, तुम तक पहुंचे तो छटंकी देना ।

Sunday, February 7, 2016

वो तुम कहती थी ना !



1) हर ठेस को और गहरा कर जाती है 
लकीर रिस के निकल जाती है बातें
कच्ची मिट्टी सा दिल सब कुछ नहीं संभाल पाता
ये भरम मत रख , इस खामोशी पे न जा
जिन्दगी ! किसी रोज उठ के तुझे जी भर के कोसना है 


2) मैं लंबी कविता लिखना चाहता था
तुम बस मेरे कान तक पहुँच पाती थी
उचक कर एड़ियो के बल 


3) महंगे बर्फ़ के फ़ायों को किश्तों में भी खरीदा न सका, बारिश मुफ़्त है हमें
वही बात है कि जैसे गिरवी ही सही पर हिफ़ाजत में हो जिन्दगी।


4) बाकि तो मैं प्रेम व्रेम कुछ नहीं जानता पर चाहता हूं
जो चाकलेट खाऊं
उसमें से एक टुकड़ा तुम्हें भी दूं, वो भी हमेशा नहीं !


5) मुरव्वत ना सही
इतना ही हो पाया
सुबह से शाम करना
अब जाड़ो का रोजगार है
दिन भर ठुर्ठुराहाट !


६)अभी एक ताजा ताजा सांस ली है
वो तुम कहती थी ना !
आओ कुछ नया करें

७)गुड नाएट !
नाएट मे गुड़ कहाँ है, सब फ़ीका फ़ीका है रे !
P.S
बंदगी रास आने लगी है मुझे
अब डर है कहीं कोई खुदा मिल ही ना जाए ।

Sunday, June 1, 2014

तुम्हारी याद जो है...

सुबहों में एठें हुए खाली हाथों मे 
ऐसा लगता है
खोखले कपों से रिसती है चाय 
इस सुबह में ऐसा लगता है
चांदी का वर्क लपेट के ठूस दी गई है खुशबू
अब भी बिस्तर से समेट के 
जाने कौन इस तन का बोझ
उठा के  चल देता है कई रोज
रूह रिसती तो थी बदन से
पर रास्ते में निशां नहीं पड़ते
खत्म हो चुकी होगी शायद ।


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तुम्हारी याद जो है...
आंखों में ड्राप डालनी है ना,
सो आ रही है !


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तुम्हें चुप कराने के कई तरीकें सोचे हैं
ये सोचकर की तुम फिर बोलोगे कभी ।


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माइक्रोफ़ोन से तुम्हारी सांस टकराती है जब,


1) मैनें डायरी के बीच से निकाला हुआ एक फूल उसे देते हुए कहा 
"देखो ऐसे कहीं मुरझा न जाना"
उसने कहा "मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं" 
और गिफ़्ट करते हुए एक घड़ी हाथ में पहना दी 
वक्त उस घड़ी की सुइयों में टिक टिक करता हंसता रहा |
वक्त अपनी झोली में कितना और कितनों को लेकर चला जाता है
रहने और रह जाने में कितना अंतर है ना !
जिन्दगी से कोई उम्मीद नहीं पर जिन्दगी अब भी उम्मीद से है


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2) कोई बेचैनी सी है, गिरते पड़ते चलना 
जैसे इस कैफ़ियत का कोई परमानेंट ऐड्रेस नहीं है 
रोकी हुई कोई नदी है 
गोया जैसे सोया है कोई जुनून 
सहमी हुई बगावत और ढर्रे ढर्रे चलता हुआ इमान ।
'इश्क' इस हाल का कहीं बेह्तर पता है 
'प्यार' नहीं इसमें ’तू’ तो है पर तेरा होना कोई जरूरी भी नहीं
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3)किसी किस्से का,
किसी बात का,
या फिर किसी गहरी चुप सी सांस का,
रिप्लाई ना भी करो तो चलेगा ।
इतना बहुत है की माइक्रोफ़ोन से तुम्हारी सांस टकराती है जब,
ग्राहम बेल को बहुत दिल से दुआ देता हूं मैं ।

Wednesday, September 18, 2013

ये वक्त भी बदलेगा कभी ?



1)कभी जब साँसे जिल्लत हो उठती हैं
और कितनी ही परेशानियां जहन में हलके से खटखटाकर लौट जाती हैं
ये देखकर, कि कोई ज्वार अभी अभी उतरा है,
भीतर एक सन्नाटा छाया हुआ है
सब तियां पांचा हुआ जाता है
पूछिए की पैरेलाइज होना किसे कहते है

2)Insomnia with you 
Insomnia without you
The difference between the two is everything.
Neither me , Nor You.

(Inspired by Rumi Sayings)

3)" बारिश के दिनों में भी अनयूस्ड छाता, 
घंटे भर पुरानी च्यूइंग्म,
उलझे हुए हेड्फोन 
और बिना प्रेस किये कपड़ो को लटकाने वाला हेंगर"
कमरा नहीं स्लैम बुक लगता है
अपने ही बारे में बड़ी डीटेल में भरा हुआ !


4)
गले मे एक तरफ़ होने वाला दरारों सा दर्द 
और खाली हास्टल के दूसरे विंग मे बस एक और बीमार दोस्त !
फोन की कन्टेक्ट लिस्ट को देखते हुए शर्मसार हुआ जाता हूं ,
 कि अब किसे कहूं कि बीमार हूं मैं !


5)
डिप से चाय में रंग घुल रहा है
हर बार डुबाने पे रंग कुछ और गहरा हुआ जाता है
मुसलसल हुई जो तुमसे 
मुलाकात याद आ रही है !


6)
छ्त की पटालों पे बिछे कपड़े मैले नहीं होते
धूल को आलस है या थकान, 
बरसो यूं ही उड़ते फ़िरते रहने से
ना सफ़र में कोई परिन्दा निकलता है ,फिर भी क्या
ओखल का पानी बदलता होगा कोई ?
पिताजी एक नई घड़ी कब देंगे
ये वक्त भी बदलेगा कभी ?


7)
चाय का कप थमा के चली जाती मां
या सर में गर्म तेल की मालिश करती तो एक बार लगा था कि
मां के लिये ये सब इतना स्वाभविक क्यों है
जैसे ये करना ही उसका होना है
जैसे बहना नदी का
या खुशबू फूल का
ये देना या करना नहीं है
होना है शायद, जरूर !
अनमना सा हूं रात के खाने की प्लेट में
भूख है अब या नहीं..
मां चुपचाप दो रोटी लेकर आ जाती है
दूसरी रोटी के आखिरी गास में अचानक समझ आता है
मां को पता है
भूख को कितनी भूख है!

Thursday, February 21, 2013

सुबह की रजाई है




१) जिन्दगी तू भी !
सुबह की रजाई है , 

खींच के ओड़ने से जो क्या पूरी पड़ जाएगी


२)कप भर की रात है
हर चुस्की के बाद देखता हूं कितनी बची
तकिये पे चड़ के दिमाग तक पहुंचने की जुगत में है चैन
पर सीना है कि लगता है
किसी ने कोयले ढक दियें है राख से
ताकि सुलगते रहें रात भर ।



३)एक बात दिखा पाता तुम्हे,
जब तीन छोटे कुत्ते, ठंड से ठिठुर कर एक दूसरे में कहीं छुप जाना चाहते हैं।
जब कई चीलें ऊंचे पतझड के पेड़ों मे पंचायत लगाती है।
जब लाल सूरज रुका हुआ दिखाई पड़ता है धान के खेतों के पार
जब पेड़ से उतरती है एक चौकस नन्ही गिलहरी
जब खाने की टेबल के नीचे एक सफ़ेद बिल्ली मेरे पैरों मे अपना सर सहलाते हुए चली जाती है
जब एक पत्ता टूट कर हवा के हवाले हो जाता है
जब कई बार मै वही नहीं कहता जो मैं जानता ही नहीं
धूप की संगत मे बिगड़कर ठंड़ रूठ जाती है
बड़ी उलझन है
मैं मनाऊं किसे !

४)सर्दी में सर्दी की बातें, ख्याल सरदर्दी का
ठंड में तलवों को बुने हुए मोजों की हमदर्दी का
मलहम सा कोई लफ़्ज
हाथ आ जाए तो ,
रिश्तों से कतरनें मुफ़त मिली तो
कुछ बातें सिलनी हैं
मुलाकातें सिलनी है ।