Saturday, September 15, 2018

कुछ शहर ऐसे होते हैं

1)कुछ शहर ऐसे होते हैं , जिन पर कविताएं लिखी जाती हैं
कुछ लोग ऐसे होते हैं , जिन पर गीत लिखे जाते हैं 
ये एक ऐसा ही शहर है
तुम कुछ उन लोगों में से हो ।

2)फीका फीका सा सूरज 
और मीठी जलेबी
मेरे घर के आगे का आसमान घिरने लगा है 
मकानों की मंजिल उठने लगी है 
शहर छोड़ के जाने वाला है कोई 
उस गली से आज कोई बारात निकल रही है

3)तुम्हारे गुजरने से जो खुश्बू कमाल आई है
यूं के जैसे.
पड़ोस की आमा के चूल्हे में ठठंवाणी उबाल आई है
मैं तिरे पींछे उस दिन से खड़ा था
कि उसी दिन
जिस दिन तेरी झोली में जीरे का तड़का पड़ा था
तिरी जुल्फ़ों में आटे का जो गुबार उड़ के आया था
तुझे दिखाता
उस रात मेरी रो्टी मे पलथन सवा ग्राम जुड़ के आया था
ठेले पे तू जों सहेली को फ़ूंक फूंक के खिलाएगी समोसे
हार मरा कि
बिना पूरी के पानी आएगा मिरे लबों से

इक दखल है

इक दखल है
सिलवटों से बांधी इस अलसाई रात में
पलटना चादर पे।
ख़्वाब का लिखा, 
नींद तोड़ के बह जाता है ।
मैं पलटता तुम्हे ,
किसी सस्ते उपन्यास के खुरदुरे पन्ने सा
पर मेरा टच
किंडल की स्क्रीन सा अनरिस्पांसिव है ।
भीड़ को स्क्रॉल करो तो
इश्तिहार की तरह आतें हैं लोग
इसलिए
मैंने लिखा तुम्हे एक लव लेटर और
फाड़कर फैला दिए
तुम्हारी वेब हिस्टरी में
कैप्चा के ये टुकड़े।


Monday, January 15, 2018

धूप

तुम कपड़े सुखाने छत पे  जाना
साथ ले जाना चादरें और रजाई
मत ले जाना तकिया
नमकीन सी खुशबू , कब कौन पहचान ले
फर्स्ट फ्लोर पे रहने वाले
अगरबत्तियां जलाते हैं दिन में
रूह को सीलन लग गई है
पचमंजली ईमारत के तहखाने में रहते हुए
मैं इस मई घर जाऊँगा
और ले आऊंगा तुम्हारी छत के टुकड़े
मन पे रख लेना 
जिन पर धूप लगी
वहाँ उग आती है दूब
कुछ सेक लगे मन को शायद
और फूट पड़ें कुछ हजारी के फूल 
ढटुए ही सही | 

Saturday, October 28, 2017

जिन्हे उड़ाया करते थे प्लेन बनाके

जिन्हे उड़ाया करते थे प्लेन बनाके छत से
पुराने पैम्पलेट में छपे हुए छात्र संघ के नेता
मिलते हैं उड़ाते हुए अब किसी और की पतंगे
वो कैसा घर था की जिसमे पांचवीं मंजिल भी थी
और फिर एक आँगन भी मौजूद था

किसी रोज एक गुसलखाने की छत ही उठाकर बदल दिया था ठिकाना नलके का
लकड़ी की सीढ़ियों से फर्श की उलटी छत
एक धूल का फांक उठाती थी
मेरे कमरे की छत में नक्शा उकेरा हुआ है एक
सुन्दरबन के डेल्टा सा लगता है कुछ
नील के हाशिये के बीच में बहती लकीरों को
देख के कलाई की नसें भर आया करती हैं

वो जो सबसे ऊपर की मंजिल का कमरा है
हवाओं की सोहबत में बिगड़ा हुआ है
एक छोटी सी रसोई रहती है बगल में
जिसमे कोई अलमारी नही
पर कमी नहीं होती बिल्लियों को चूहे की
और एक झरोखा खुला हुआ है बगल में
जिसमे खुलती है पटालों की छतें
घर खुलता था छत पे
नीम्बू अचार और बड़ी पापड
हाथ बदलते रह्ते है
मीलों की छत पे
घर किसे छोड़ता है
हम ही बेवफा हुए
जो भी चला जाए अभी भी
कोठरी जाड़ों में गर्म रहती है
उस कोठरी की नींद में सपने आते हैं
शतरंज , गणित और कैरमबोर्ड के
कौन खेलता है ये नहीं दिखाई देता 

अलमोड़ा की जलेबी’



१) यूं  गुड़गुड़ाए बैठे हो महल्ले की छत में, दूर तक कोहरा निकलता है। 
हुक्के के हिस्से की सुबहें अब सिगरेट की खाक छानती हैं ।

२) ‘बरेली की बर्फ़ी’ सा कोई सस्ता उपन्यास लिखा कभी तो 
तुम्हारी क़सम उसका नाम ‘अलमोड़ा की जलेबी’ रखूँगा !

३) O मेट्रो में सीट पाने वालों 
बैठे रहो के हक़ है तुम्हारा 
पर जो ऐसे मेट्रो लाइन पैनल की ओर को घड़ी घड़ी देखते हो 
किसी को उम्मीद हो उठती है 
के तुम भी उठने वाले हो 
इसलिए डाल लो कानो में हेड्फ़ोन
और डूब जाओ यूटूब में
या गाना या सावन के शोर में
धँसा लो आँख किंडल की बिना led वाली स्क्रीन पर
और करो इंतज़ार
महाभारत के समय के उद्घोष का
अगला स्टेशन .......... है
दरवाज़े बाँयी तरफ़ खुलेंगे

४) कुछ कमाल है न ,
वो ख्याल ,वो जो बिना पूछे कर दिया जाता है|
 सफर में हूँ तो कोइ पूछे नहीं खाने के लिए , बताए भी नही के बना के रखा है 
कह देने से ,पूछ लेने से पता नहीं क्या कम हो जाता है | जैसे प्लास्टिक के फूल हो गए हों |



वव्हाट्सप्प की चैट हिस्टरी



तुमने भेजी हैं जो  
फैज़ की गजलें 
गुलजार की त्रिवेणियाँ 
और पॉश की कवितायेँ 
दब चुके हैं 
वव्हाट्सप्प की चैट हिस्टरी में |
उन्हें ढूढ़ना कुछ ऐसा है
जैसे तुम्हारी मुस्कराहट से छानना शिकायतें
सागर से निकाल लाना कागज़ की कश्तियाँ
माना के कुछ भी नामुमकिन तो नहीं
पर तुम्हारी कॉलर ट्यून पे जब भी सुनता हूँ
"मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग "
कर लेता हूँ स्टेटस अपडेट
"मेरी दोस्त, मैं अब विदा लेता हूँ"
कितना स्क्रॉल करूँ अतीत को
की सेव कहाँ होता है
किसी से रोकर गले मिलना |



Monday, January 9, 2017

रेलगाड़ी

१)कमर में स्वेटर बांध, कुछ मील कड़ी धूप में
मट्टी के टीलों के इस ओर, पतझड़ के पेड़ों के नीचे
छितरी हुई छांव के बीच
पानी की आखिरी दो घूंट बोतल में बचाए हुए
एक पैदल सफ़र का बकाया याद है ।
मैने तो लगता था कि जिन्दगी ठहर सी गई है
पर उसे शायद, लगता है ठीक ठीक यहीं पहुंचना था.॥

२) पहला ही रोजगार और घाटा ही घाटा
सौदा तुम पे हो यारों तो ऐसा न हो ।

३)"कितनी ही चम्मचें खोई है ,खाई हैं मिर्चियां !
हर बार इक रोटी बचाई , किसके लिये ?
किसके लिये दाने रखे, जूठे चखे, किसके लिये ?
कभी चींटी से चीनी के भी सौदे किये , जिसके लिये !!"

४)ट्रेन जब कभी किसी मुड़े हुए ट्रैक पे खुद को पलट के देखती है, सीटी बजाती है !|
C1 की विंडो सीट पे कहीं तुम तो नहीं ?

५)यही हासिल-ए-मुलाकात रह गया
तुम सवा हो गई मैं पौना रह गया !!