Saturday, October 28, 2017

जिन्हे उड़ाया करते थे प्लेन बनाके

जिन्हे उड़ाया करते थे प्लेन बनाके छत से
पुराने पैम्पलेट में छपे हुए छात्र संघ के नेता
मिलते हैं उड़ाते हुए अब किसी और की पतंगे
वो कैसा घर था की जिसमे पांचवीं मंजिल भी थी
और फिर एक आँगन भी मौजूद था

किसी रोज एक गुसलखाने की छत ही उठाकर बदल दिया था ठिकाना नलके का
लकड़ी की सीढ़ियों से फर्श की उलटी छत
एक धूल का फांक उठाती थी
मेरे कमरे की छत में नक्शा उकेरा हुआ है एक
सुन्दरबन के डेल्टा सा लगता है कुछ
नील के हाशिये के बीच में बहती लकीरों को
देख के कलाई की नसें भर आया करती हैं

वो जो सबसे ऊपर की मंजिल का कमरा है
हवाओं की सोहबत में बिगड़ा हुआ है
एक छोटी सी रसोई रहती है बगल में
जिसमे कोई अलमारी नही
पर कमी नहीं होती बिल्लियों को चूहे की
और एक झरोखा खुला हुआ है बगल में
जिसमे खुलती है पटालों की छतें
घर खुलता था छत पे
नीम्बू अचार और बड़ी पापड
हाथ बदलते रह्ते है
मीलों की छत पे
घर किसे छोड़ता है
हम ही बेवफा हुए
जो भी चला जाए अभी भी
कोठरी जाड़ों में गर्म रहती है
उस कोठरी की नींद में सपने आते हैं
शतरंज , गणित और कैरमबोर्ड के
कौन खेलता है ये नहीं दिखाई देता 

अलमोड़ा की जलेबी’



१) यूं  गुड़गुड़ाए बैठे हो महल्ले की छत में, दूर तक कोहरा निकलता है। 
हुक्के के हिस्से की सुबहें अब सिगरेट की खाक छानती हैं ।

२) ‘बरेली की बर्फ़ी’ सा कोई सस्ता उपन्यास लिखा कभी तो 
तुम्हारी क़सम उसका नाम ‘अलमोड़ा की जलेबी’ रखूँगा !

३) O मेट्रो में सीट पाने वालों 
बैठे रहो के हक़ है तुम्हारा 
पर जो ऐसे मेट्रो लाइन पैनल की ओर को घड़ी घड़ी देखते हो 
किसी को उम्मीद हो उठती है 
के तुम भी उठने वाले हो 
इसलिए डाल लो कानो में हेड्फ़ोन
और डूब जाओ यूटूब में
या गाना या सावन के शोर में
धँसा लो आँख किंडल की बिना led वाली स्क्रीन पर
और करो इंतज़ार
महाभारत के समय के उद्घोष का
अगला स्टेशन .......... है
दरवाज़े बाँयी तरफ़ खुलेंगे

४) कुछ कमाल है न ,
वो ख्याल ,वो जो बिना पूछे कर दिया जाता है|
 सफर में हूँ तो कोइ पूछे नहीं खाने के लिए , बताए भी नही के बना के रखा है 
कह देने से ,पूछ लेने से पता नहीं क्या कम हो जाता है | जैसे प्लास्टिक के फूल हो गए हों |



वव्हाट्सप्प की चैट हिस्टरी



तुमने भेजी हैं जो  
फैज़ की गजलें 
गुलजार की त्रिवेणियाँ 
और पॉश की कवितायेँ 
दब चुके हैं 
वव्हाट्सप्प की चैट हिस्टरी में |
उन्हें ढूढ़ना कुछ ऐसा है
जैसे तुम्हारी मुस्कराहट से छानना शिकायतें
सागर से निकाल लाना कागज़ की कश्तियाँ
माना के कुछ भी नामुमकिन तो नहीं
पर तुम्हारी कॉलर ट्यून पे जब भी सुनता हूँ
"मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग "
कर लेता हूँ स्टेटस अपडेट
"मेरी दोस्त, मैं अब विदा लेता हूँ"
कितना स्क्रॉल करूँ अतीत को
की सेव कहाँ होता है
किसी से रोकर गले मिलना |



Monday, January 9, 2017

रेलगाड़ी

१)कमर में स्वेटर बांध, कुछ मील कड़ी धूप में
मट्टी के टीलों के इस ओर, पतझड़ के पेड़ों के नीचे
छितरी हुई छांव के बीच
पानी की आखिरी दो घूंट बोतल में बचाए हुए
एक पैदल सफ़र का बकाया याद है ।
मैने तो लगता था कि जिन्दगी ठहर सी गई है
पर उसे शायद, लगता है ठीक ठीक यहीं पहुंचना था.॥

२) पहला ही रोजगार और घाटा ही घाटा
सौदा तुम पे हो यारों तो ऐसा न हो ।

३)"कितनी ही चम्मचें खोई है ,खाई हैं मिर्चियां !
हर बार इक रोटी बचाई , किसके लिये ?
किसके लिये दाने रखे, जूठे चखे, किसके लिये ?
कभी चींटी से चीनी के भी सौदे किये , जिसके लिये !!"

४)ट्रेन जब कभी किसी मुड़े हुए ट्रैक पे खुद को पलट के देखती है, सीटी बजाती है !|
C1 की विंडो सीट पे कहीं तुम तो नहीं ?

५)यही हासिल-ए-मुलाकात रह गया
तुम सवा हो गई मैं पौना रह गया !!

Monday, February 8, 2016

अफवाह

1) मैं चल सकता था पर घर पे ही रहता था
कोर्ई नाम होता तुम्हारा, गर तुम होती |
जां से ज्यादा किस की कैफियत में उदास रहता,
इक यार है ये कमरा.
जिससे तुम्हारी शिकायत करता रहता हूँ।
हिज्र के स्टेटस बदलते रहते हैं
सीढ़ी पे जां मिलते ही
गिरा देती है कमर के बल
मैं घर पे ही रह सकता हूँ पर चलना चाहता हूँ ।



2)दीवार पे एक तितली बैठी है छोटी सी -खूबसूरत !
थोड़ी दूर 10 सेंटीमीटर पर एक मकड़ी
तितली की तरफ बड़ रही है - भयानक !
सोच रहा हूँ तितली को उड़ा दूं- दया !
पर उससे मकड़ी भूखी रह जाए , शायद भूख से मर जाए - असमंजस !!
मेरा कुछ भी करना या ना करना - दखल ।
तितली आप उड़ गयी - तितली के लिए खुश मकड़ी के लिए अफ़सोस।
मैं उड़ा, मैं बचा, मैं भूखा रहा, और मैं ही देख रहा हूँ-एकमात्र संभावना ।

3) गिरेबां से खींच के तोड़े हैं जो बटन तुमने 
काज में अब भी अटकते नहीं 
सुई ने सीना ही सिल दिया हो तो कोई क्या कीजे |

4) अफवाह उड़ा रहा हूँ, तुम तक पहुंचे तो छटंकी देना ।

Sunday, February 7, 2016

वो तुम कहती थी ना !



1) हर ठेस को और गहरा कर जाती है 
लकीर रिस के निकल जाती है बातें
कच्ची मिट्टी सा दिल सब कुछ नहीं संभाल पाता
ये भरम मत रख , इस खामोशी पे न जा
जिन्दगी ! किसी रोज उठ के तुझे जी भर के कोसना है 


2) मैं लंबी कविता लिखना चाहता था
तुम बस मेरे कान तक पहुँच पाती थी
उचक कर एड़ियो के बल 


3) महंगे बर्फ़ के फ़ायों को किश्तों में भी खरीदा न सका, बारिश मुफ़्त है हमें
वही बात है कि जैसे गिरवी ही सही पर हिफ़ाजत में हो जिन्दगी।


4) बाकि तो मैं प्रेम व्रेम कुछ नहीं जानता पर चाहता हूं
जो चाकलेट खाऊं
उसमें से एक टुकड़ा तुम्हें भी दूं, वो भी हमेशा नहीं !


5) मुरव्वत ना सही
इतना ही हो पाया
सुबह से शाम करना
अब जाड़ो का रोजगार है
दिन भर ठुर्ठुराहाट !


६)अभी एक ताजा ताजा सांस ली है
वो तुम कहती थी ना !
आओ कुछ नया करें

७)गुड नाएट !
नाएट मे गुड़ कहाँ है, सब फ़ीका फ़ीका है रे !
P.S
बंदगी रास आने लगी है मुझे
अब डर है कहीं कोई खुदा मिल ही ना जाए ।

Sunday, June 1, 2014

तुम्हारी याद जो है...

सुबहों में एठें हुए खाली हाथों मे 
ऐसा लगता है
खोखले कपों से रिसती है चाय 
इस सुबह में ऐसा लगता है
चांदी का वर्क लपेट के ठूस दी गई है खुशबू
अब भी बिस्तर से समेट के 
जाने कौन इस तन का बोझ
उठा के  चल देता है कई रोज
रूह रिसती तो थी बदन से
पर रास्ते में निशां नहीं पड़ते
खत्म हो चुकी होगी शायद ।


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तुम्हारी याद जो है...
आंखों में ड्राप डालनी है ना,
सो आ रही है !


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तुम्हें चुप कराने के कई तरीकें सोचे हैं
ये सोचकर की तुम फिर बोलोगे कभी ।


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