Thursday, February 21, 2013

सुबह की रजाई है

मैं बक्कखल की एक कटोरी छुपा लेता हूं..
नींबू अब भी सानते है छत पे
जनवरी की दुपहरी में ,
मेरे ही हाथ सने है भगौने में ..कलाईयों तक रस बहता है
जिसमें शामिल है भांग का भूना हुआ नमक और गुड़ की रसती
छतो से छतों तक.. बुआ , बैंड़ी, दीदी..आमाए फ़ैली हुई है..
उन्हे तस्स्वुर-ए-जाना नहीं है... पर फ़ुरसत बड़ी है
जहां तक स्वाद जाता है..एक टुक्ड़ा , एक कटोरी बंट ही जाता है
मैनें अपने लिये भघौने मे और
बक्खल में बचा लिया है
थोड़ा सा रस
तुम्हारे लिये भी..
मुझे फ़ुर्सत नहीं है..पर तस्व्वुर ..अजी क्या कहिये !

ए जिन्दगी तू भी !
सुबह की रजाई है , खींच के ओड़ने से जो क्या पूरी पड़ जाएगी !!
कप भर की रात है
हर चुस्की के बाद देखता हूं कितनी बची ?
तकिये पे चड़ के दिमाग तक पहुंचने की जुगत में है चैन
पर सीना है कि लगता है
किसी ने कोयले ढक दियें है राख से
ताकि सुलगते रहें रात भर ।
एक बात दिखा पाता तुम्हे,
जब तीनों छोटे कुत्ते ठंड से ठिठुर कर एक दूसरे
में कहीं छुप जाना चाहते ।
जब कई चीलें उंचे पतझ्ड़ के पेड़ों मे पंचायत लगाती है।
जब लाल सूरज रुका हुआ दिखाई पड़ता है धान के खेतों के पार..
जब पेड़ से उतरती है एक चौकस नन्ही गिलहरी
जब खाने की टेबल के नीचे एक सफ़ेद बिल्ली मेरे पैरों मे अपना सर सहलाते हुए चली जाती है..
जब एक पत्ता टूट कर हवा के हवाले हो जाता है ..
जब कई बार मै वही नहीं कहता जो मैं जानता ही नहीं..
धूप की संगत मे बिगड़कर ठंड़ रूठ जाती है
बड़ी उलझन है
मैं मनाऊं किसे !

सर्दी में सर्दी की बातें, ख्याल सरदर्दी का
ठंड में तलवों को बुने हुए मोजों की हमदर्दी का
मलहम का कोई लफ़्ज
हाथ आ जाए तो ,
दर्जी से कतरने मुफ़त मिली तो..
कुछ बातें सिलनी हैं
मुलाकातें सिलनी है ।