Monday, October 15, 2012

खिर्चियां..!

1) सुबह सुबह उठने से शायद पहले ही, कोई माथे पे हाथ रख के नाप गया
बुखार ! कितना लम्बा हो गया है तू
खातिरदारी होनी थी प मां अनजान है !
खैर,कुछ पुर्शिस-ए-तबीयत को फोन काल और बिस्तर पे डीसर्वड नींद !
या इलाही बुखार ये तबीयत
कुछ दिन और !

2)अभी देश सारे दिल के ये मेहमान बिन बुलाए जाए
कोरी नाराजगी 

तुझे निहारूं के छुपाऊ कभी छोटा सा संदेश
हीर ! रांझना ना आए ।
आए तो भी ना भाए, जाए तो जी घबराए
दिल के ठूंठ टूट जाए, टेड़ी बात पे अड़ जाए ।
तेरी जलेबी कि फ़िक्र मे 

मेरी चासनी का तार टूट जाए
पी जाए कौन जाने कैसे
सुराही की गर्दन फ़ूट जाए ।
आलसी तू और तेरे से ही 

फ़ुर्सत भरे तेरे ख्वाब ..
तू शुक्र है सन्डे है.

कैसे ये हो के नींद जल्दी टूट जाए ।

3) आधी सुनकर आधी छोड़ दी है मैने
देखो अबकी बता रहा हूं
गजल जूठी है 
तुम अपने हिस्से की चाय कब पीओगी !



4)
उसकी उंगली मे मिठास खत्म नहीं होती कभी
उसने पूरे कमरे का एक गोल गोल हवाई जहाज चक्कर लगाया ,
फिर कमरे में पड़ी हर चीज को टकटकाई लगाए देखने लगा
बोतल को बार बार गिराकर उसे खाली समझता
फिर उठाता और पानी को सीध मे देख कर तालियां बजाता
नींद से लड़ाई है उसकी ..
पर आंखे साथ नहीं दे नहीं दे रहीं
उसे तितली वाली कहानी सुनानी थी शायद !

5)सब कुछ बदल गया है
फ़िक्र के तसले भर भर के रोज सीढ़ी के कई चक्कर लगाता है कोई
शाम थकी हुई, उलझी हुई,  मुंह फ़ेर लेती है
उधड़ा हुआ चेहरा देखकर ।
बिना सिगरेट के ही हवा के कई लम्बे लम्बे कश लगाता हूँ
और कान बन्द कर लेता हूँ 
कि वही बातें, वही कोशिस
आइए गप मारें, प कुछ कहिए
कुछ ऐसा जो 
खुद देखा हो
खुद समझा हो, खुद जाना हो...

कम से कम एक दिन जिन्दगी में खुद को डुबोकर आना
बड़ी बातें करनी हैं
प अभी उन्हे होना बाकी है..
सब कुछ संभावना के क्षेत्र में है
यहां आग भी लगी हो तो वाह
पर इसके नीचे तो बाग भी सजाए हुए हैं
तो बासी गुलाब उगते है ।

6)जुल्फों  की गिरफ़्तारी मंजूर  है हुजूर.
शर्त ये, 

सजा कैद-ए-बामश्क्कत हो ,
तहखाने में भी यूं ही बैठे रहेंगे
तो क्लिप कौन ढूंढेगा