Monday, October 15, 2012

हां अब बिल्कुल ठीक हूं

रात होती है, घर नहीं भी है जाने को, पूरा शहर मानो रहने का ठिकाना बन जाए | जहां चाहो, जब चाहो बैठ जाओ।
हरिद्वार ( हर की पौड़ी के चारो ओर) उतना ही ठहरा है जितना किसी इतवार को अल्मोड़ा की बाजार | पुरानी इमारतें मिटटी और लकड़ी के दरवाजों वा
ली चाय की दुकान, छोटी छोटी अन्गिनत गलियां जिनमें से किसी में भी घुसते हुए खो जाने का डर नहीं होता| बड़ी कतारो सी दुकानें हैं, लोग नये हैं पर लगता है ये दुकाने आप को कभी पहले से जानती है| बुलाती हैं मुस्कुराते हुए।
९ फ़रवरी २०११ की सुबह उठा | देखा, राजू कालेज चला गया है । कुछ अटका हुआ था मन में जिसे बाहर निकालने का मन नहीं था | फ़ोन में कोइ मेसेज नहीं और तब जब लोनलीनेस सालिट्यूड में कन्वर्ट नहीं हुई थी |
बाजार से दध लाकर दो ब्रेड खाई, और इसी सब के दौरान मोबाएल चार्ज कर लिया । कान में हेडफ़ोन लगाया और निकल पड़े | कहीं से कहीं को | जाना ही था | बादल सावंले थे, और तलवे सख्त | उन जगह से गया, जहां से पहले कभी नहीं गया था | अबकी कोई काम न था सो,  बस निकल पड़ा था | शहर की नहर के बाहर की गंगा के पास एक जगह थी | बिल्कुल सुनसान, किनारे रेत, एक सूखा हुआ पेड और कुछ सफ़ेद पक्षी | कई घंटे इसी जगह बैठा रहा |
हर की पैड़ी के आगे गंगा के किनारे बाबाओं ने झोपड़े बना रखे है | इस जगह कोई आता भी नहीं है । यहां एक चबूतरा बना हुआ है | यहीं एक लैप्रोसी  का हास्पिटल है। कुछ सवाल अभी भी चल रहे हैं |पर उन्हे इग्नोर कर इस लोफ़रिया घुमक्क्ड़ी का मजा ले रहा हूं | मन अभी भी भारी है |
मां का फ़ोन आता है .." आज बारिश हो री , मैं बिस्तर में ही हूं...हां । राजू गया कालेज..मेरी छुट्टी है.,..हां सब ठीक " ..अचानक बारिश होने लग गई है | थक के चूर हो गया हूं, पिछले छ घन्टे से घूम रहा हूं, अब वापिस चला जाए| पर पहले एक चाय,एक और....और एक और ।
आटो पकड़ के वापस आ कमरे मे पहुंचते  ही, ..राजू आ गया है!
कहां था?
बाजर गया था दूध लेने ।
कहां है दूध ?
उसकी तो चाय बनाके पी ली !
तू ठीक तो है ना ?
हां अब बिल्कुल ठीक हूं ।