Saturday, July 28, 2012

सब सर्दियां एक सी नहीं होती , और सब सुबहें भी..

सलीका अब भी नहीं... न लिखने का.. न पढ़ने का ।
कुछ जो प्रत्यक्ष नहीं है ... बेतरतीब बैठे हुए सर पे मार के कहता है. लिख.. क्या ?
लिख फिर सोचना क्या  ?
आग्रह व कामना ने कई बार कहा ... पर मैं लेखक नहीं . ..
जब कई बार एक अनाम संसार ने मुझे स्याही में डुबाया... कुछ गाया.. बोला..लिखा !




हर नज़र दर नज़र बस मुस्कुरा देना है....क्योंकि
छुपा के रखूंगा गर कुछ भी तो मशहूर हो जाएगा....!!

यहां वहां , कितनी चमक है ना !
धूल के अंबारो से ठीक बराबर उतना ही कमरे मे छोड़ दिया है ,जितना भी उजाला किखिड़की के छेद से निकल के जबरदस्ती तुम्हारी आंखो मे पहुंचना चाह रहा होता है.। सुनहरा सूरज एक डुबकी मे इतने छीटें मारता है कि तुम कितना ही झल्लाओ, उठना ही पड़ता है. ।
और उठो ! के तुम ना उठो
तो इक काला बादल बरसने को तैयार बैठा है ।
जानता हूं, तुम्हे भीगना नहीं पसन्द पर तुम्हे भी तो बरसना खूब आता है...,
और कहीं तर हुए जहन ने सर्दी पकड़ ली तो फिर चाय भी बनानी पड़ेगी !
काली मिर्च, अदरक और इलायची इलमारी तीसरे खाने में रखे होंगे, और ना मिले तो...
बस इक बार फ़ूंक देना ,
और गिरा भर देना मेरी शर्ट पे ! कि इतनी छीकों मे हर बार पलक झपकाते हुए डरता हूं कि
सब सर्दियां एक सी नहीं होती , और सब सुबहें भी..