Wednesday, September 18, 2013

वक्त

1) डिप से चाय में रंग घुल रहा है
हर बार डुबाने पे रंग कुछ और गहरा हुआ जाता है
मुसलसल हुई जो तुमसे 
मुलाकात याद आ रही है !


2)
छ्त की पटालों पे बिछे कपड़े मैले नहीं होते
धूल को आलस है या थकान, 
बरसो यूं ही उड़ते फ़िरते रहने से
ना सफ़र में कोई परिन्दा निकलता है ,फिर भी क्या
ओखल का पानी बदलता होगा कोई ?
पिताजी एक नई घड़ी कब देंगे
ये वक्त भी बदलेगा कभी ?

2 comments:

  1. (फोन की कन्टेक्ट लिस्ट को देखते हुए शर्मसार हुआ जाता हूं , कि अब किसे कहूं कि बीमार हूं मैं ! )
    *
    ऐसी ही एक लिस्ट खंगाल रहे हैं हम भी, कोई नज़र नहीं आता जिससे कह सकें कि कुछ कहने का मन है...!

    भावभीनी पोस्ट!

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  2. 5) चिट्ठीए नि... दर्द फ़िराक वालिये |
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