जिन्दगी
तू यूं भी तो गुजर ही जाएगी.
चलो ! फ़कत ही सही ।
वो अरसा, वे लोग
कुछ काम की नहीं तू..
सो तेरा इस्तेमाल तो न हुआ
चलो ! खपत ही सही ..
2) क्यों तेरी मजदूरी में भी अवसाद के उधार नहीं चुकते ?
गर्द चड़ी मोटी खाल से टपकते पसीनों में लथपथ आ गई है.. । मुहं भी उठा किस राह गई ? ..किसके पीछे ?
जहन के ख्यालों मे हीक आ गई है ?
अंगड़ाई भी चिपचिपाने लगी है..गले भी लगाता तो बाजुओं से सरक कर बेशर्म रह गई है ।
जिन्दगी तू भी खालिश प्रेम गीत है .... ।
चंद वाह वाह और कदरदानों कि मोहताज..कि कुछ भी होती..दो रोटी का जुगाड़ तो होती ।
तू यूं भी तो गुजर ही जाएगी.
चलो ! फ़कत ही सही ।
वो अरसा, वे लोग
कुछ काम की नहीं तू..
सो तेरा इस्तेमाल तो न हुआ
चलो ! खपत ही सही ..
2) क्यों तेरी मजदूरी में भी अवसाद के उधार नहीं चुकते ?
गर्द चड़ी मोटी खाल से टपकते पसीनों में लथपथ आ गई है.. । मुहं भी उठा किस राह गई ? ..किसके पीछे ?
जहन के ख्यालों मे हीक आ गई है ?
अंगड़ाई भी चिपचिपाने लगी है..गले भी लगाता तो बाजुओं से सरक कर बेशर्म रह गई है ।
जिन्दगी तू भी खालिश प्रेम गीत है .... ।
चंद वाह वाह और कदरदानों कि मोहताज..कि कुछ भी होती..दो रोटी का जुगाड़ तो होती ।
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