Monday, January 9, 2017

रेलगाड़ी

"कितनी ही चम्मचें खोई है ,खाई हैं मिर्चियां !
हर बार इक रोटी बचाई , किसके लिये ?
किसके लिये दाने रखे, जूठे चखे, किसके लिये ?
कभी चींटी से चीनी के भी सौदे किये , जिसके लिये !!"

ट्रेन जब कभी किसी मुड़े हुए ट्रैक पे खुद को पलट के देखती है, सीटी बजाती है !|
C1 की विंडो सीट पे कहीं तुम तो नहीं ?

यही हासिल-ए-मुलाकात रह गया
तुम सवा हो गई मैं पौना रह गया !!

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