बालक सा मन
बच्चों का खेल
बचपने में चला आया
घर मेरा, घर मेरा
घर अपना नहीं था
जिसका था
वो कहता रहा
उतावलापन कम
बच्चे सा मन
समझ सयानों की
कहां समझता कुछ
सोचा नहीं, बोल दिया
बोल दिया वो भी
जो कहने वाले को
ख़ुद नहीं पता था
कि कहा सकता है
रोना इसके बाद आया
जब पता चला
खेल बच्चों के
सयाने खेल नहीं होते
सयाना रोता है
घर के लिए नहीं
आंसू बहते हैं
बच्चे की मृत्यु पर
आंगन के गीत
कविता के लिए एक ही शब्द काफी होता है- "जैसे" , जैसे तुम!
Monday, October 19, 2026
Wednesday, August 26, 2026
Friday, March 22, 2024
शहर
कुछ शहर ऐसे होते हैं
जिन पर कविताएं लिखी जाती हैं
कुछ लोग ऐसे होते हैं
जिन पर गीत लिखे जाते हैं
ये एक ऐसा ही शहर है
तुम कुछ उन लोगों में से हो
खपत
ए जिन्दगी
तू यूं भी तो गुजर ही जाएगी.
चलो! फ़कत ही सही ।
वो अरसा, वे लोग
कुछ काम की नहीं तू
सो तेरा इस्तेमाल तो न हुआ
चलो! खपत ही सही
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