Monday, October 19, 2026

बालक सा मन
बच्चों का खेल
बचपने में चला आया
घर मेरा, घर मेरा

घर अपना नहीं था
जिसका था
वो कहता रहा
उतावलापन कम

बच्चे सा मन
समझ सयानों की
कहां समझता कुछ
सोचा नहीं, बोल दिया

बोल दिया वो भी
जो कहने वाले को
ख़ुद नहीं पता था
कि कहा सकता है

रोना इसके बाद आया
जब पता चला
खेल बच्चों के
सयाने खेल नहीं होते

सयाना रोता है
घर के लिए नहीं
आंसू बहते हैं
बच्चे की मृत्यु पर

No comments:

Post a Comment